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Wednesday, January 15, 2020

गिरती अर्थव्यवस्था का क्या होगा आम आदमी पर असर

सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में गिरावट के बाद अब बढ़ती महंगाई दर भी सरकार के लिए मुश्किल बन गई है.

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक़ उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) पर आधारित खुदरा महंगाई दर में बढ़ोतरी हुई है.

दिसंबर में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 7.35 फ़ीसदी हो गई है जो नवंबर में 5.54 फ़ीसदी थी.

इसके अलावा खाद्य महंगाई दर में भी साल के आख़िरी महीने में बढ़ोतरी दर्ज की गई है.

नवंबर में खाद्य महंगाई दर 10.01 फ़ीसदी थी, जो दिसंबर में बढ़कर 14.12 फ़ीसदी हो गई.

महंगाई दर रिजर्व बैंक की अपर लिमिट को पार कर गई है, जो 2-6 फ़ीसदी है.

वहीं, रोज़गार के मामले में भी लोगो के लिए अच्छी ख़बर नहीं है.

एसबीआई की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक़ वित्तीय वर्ष 2019-20 में भारत में कुल 16 लाख नौकरियां कम हो सकती हैं.

इकोरैप (Ecowrap) नाम की एसबीआई के ये रिपोर्ट कहती है कि चालू वित्तीय वर्ष 2019-20 में नई नौकरियों के अवसर कम हुए हैं. पिछले वित्तीय वर्ष 2018-19 में कुल 89.7 लाख रोज़गार के अवसर पैदा हुए थे जबकि वित्तीय वर्ष 2019-20 में सिर्फ़ 73.9 लाख रोज़गार पैदा होने का अनुमान है.

एसबीआई की इस रिपोर्ट का आधार कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) में हुआ नामांकन है. ईपीएफओ के आंकड़े में मुख्य रूप से कम वेतन वाली नौकरियां शामिल होती हैं जिनमें वेतन की अधिकतम सीमा 15,000 रुपए प्रति माह है.

इससे ज़्यादा वेतन की सरकारी और निजी क्षेत्र की नौकरियां राष्ट्रीय पेंशन योजना (एपीएस) के तहत आती हैं.

एसबीआई की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि मौजूदा ट्रेंड को देखते हुए वित्तीय वर्ष 2019-20 में एनपीएस में भी 26490 कम नौकरियां पैदा होंगी. ग़ैर-सरकारी नौकरियां तो बढ़ेंगी लेकिन सरकारी नौकरियों में कमी आएगी.

इसी महीने सरकार ने भी चालू वित्त वर्ष में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की विकास दर पांच फ़ीसदी तक बढ़ने का अनुमान जताया था. पिछले वित्तीय वर्ष में इसकी विकास दर 6.8 फ़ीसदी थी. इससे पहले आरबीआई ने भी देश की विकास दर के अपने अनुमान को घटाकर पांच फ़ीसदी कर दिया था.

देश में आर्थिक वृद्धि को लेकर लंबे समय से चिंता प्रकट की जा रही है. सरकार ने भी इससे निकलने के लिए बीच-बीच में आर्थिक सुधार की घोषणाएं करके लोगों में उम्मीद बनाए रखने की कोशिश की लेकिन, फिर भी हालात में ख़ास सुधार नहीं हुआ है.

ऐसे में नौकरियों मे कटौती, बढ़ती महंगाई और देश की आर्थिक वृद्धि दर में कमी इन तीनों मोर्चों पर निराशा मिलने का लोगों की आर्थिक स्थिति पर क्या असर होगा. आने वाले साल में उनके लिए इसके क्या मायने हैं-

वरिष्ठ आर्थिक पत्रकार सुषमा रामचंद्रन कहती हैं, ''अगर महंगाई की बात करें तो दिसंबर में बढ़ी महंगाई के पीछे खाने के सामान की बढ़ी क़ीमतें मुख्य कारण हैं. हाल के दिनों में प्याज़, लहसुन और आलू के दाम काफ़ी बढ़े हैं. एसबीआई ने खुद कहा है कि अगर इन तीन चीजों को हटा दें तो महंगाई की दर कम हो जाती है.''

''फिलहाल लोगों के लिए मुश्किल है लेकिन आने वाले दिनों में राहत होगी. आलू, प्याज़ की नई फसल बाज़ार में आ रही है जिससे स्टॉक बढ़ेगा और दाम कम हो जाएंगे. लोगों पर सब्ज़ी के बढ़ते दामों का बोझ कुछ कम होगा और इससे पूरी महंगाई दर भी कम हो जाएगी. देखें तो ये आंकड़े दिसंबर के हैं क्योंकि अभी दाम में कुछ कमी आ गई है तो आने वाले आंकड़ों में महंगाई दर घट सकती है.''

''दूसरी बात करें नौकरियों की तो इसमें अच्छी ख़बर नहीं है. अगर नौकरियां कम हो जाएंगी तो ये अनुमान लगाया जाता है कि जिनके पास नौकरियां हैं उनकी सालाना वेतन वृद्धि (इनक्रिमेंट) भी कम हो जाएगी. जो युवा अभी नौकरियां ढूंढ रहे हैं उनके लिए ये बिल्कुल अच्छा नहीं है.''

''वहीं, आर्थिक वृद्धि को देखें तो ये साफ है कि मंदी की स्थिति है. बाज़ार में पैसे की कमी है जिसका असर नौकरियों और फिर लोगों की ख़र्च करने की क्षमता पर पड़ रहा है. भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) हर दो महीने में होने वाली बैठक में ब्याज़ दर की कटौती पर गौर करता है. आने वाली बैठक में हो सकता है कि आरबीआई बढ़ती महंगाई को देखते हुए ब्याज़ दर में कटौती न करके उसे बढ़ा दे. लेकिन, अगर ब्याज़ दर बढ़ाई जाती है तो उसका असर बहुत ख़राब होगा. जिन्होंने लोन लिया हुआ है उन पर असर होगा. ऐसे में ज़्यादा संभावना है कि ब्याज़ दर न बढ़ाई जाए और क्योंकि आरबीआई ब्याज़ दर पहले भी घटाता रहा है तो अब वह मौजूदा स्थिति में रहने की कोशिश करेगा.''

एसबीआई की रोज़गार पर आई रिपोर्ट में भी कहा गया है कि धीमी विकास दर का असर रोज़गार सृजन पर भी पड़ेगा.